Thursday, February 28, 2008
संस्मरण - 1
बहुत पहले जब मैं एक छोटा सा बच्चा हुआ करता था और शायद एल के जी या यू के जी में रहा होऊंगा या शायद और बड़ा, तब एक मजेदार घटना घटी थी। हम दोनों भाई काफ़ी धमा चौकडी मचाया करते थे और हमारे पापा जी अक्सर हमें पढ़ाई के लिए डांटा करते थे। उनका एक तकिया कलाम हुआ करता था - "पढ़ना लिखना साढ़े बाईस!"। मुझे समझ नही आया करता था कि वो ये साढ़े बाईस के आंकड़े पर कैसे पहुचे थे, एक दिन जब फिर से डांट पड़ी तो मुझ से रहा न गया और मैंने पूछ ही लिया - "पापा जी, क्या हम दोनों भाइयों की फीस का जोड़ मिला के साढ़े बाईस होता है जो आप हमें हमेशा पढ़ना लिखना साढ़े बाईस कह कर डांटा करते हैं!"
Saturday, February 16, 2008
रेड बोर्ड बस...
बेंगलूर की सिटी बसों में अलग अलग रंग के तख्तियाँ लगी होती हैं। लाल, नीली इत्यादी। लाल रंग की बसें बेंगलूर के बाहर के इलाकों से आती हैं, आस पास के कस्बों से, और सिटी मार्केट जातीं हैं। बाकी की बसें मैजेस्टिक के बस अड्डे जाती हैं या फिर शहर में ही इधर से उधर।
सिटी मार्केट जाने वाली बसों की भी एक स्टोरी है। इन लाल तख्तियों वाली बसों से बेंगलूर के आस पास के गाँव कस्बों के लोग आते रहे हैं जिन्हें खरीदारी इत्यादी करने के लिए सिटी मार्केट ज्यादा आसान पड़ता है। तो उनकी सुविधा के लिए ये बसें सीधे सिटी मार्केट जाती हैं। वहां फ्लाई ओवर के नीचे बड़ा सा बस अड्डा है। तो आप बस में लगे बोर्ड के रंग से समझ सकते हैं कि ये बस कहाँ जा रही है या कहाँ से आ रही है।
सिटी मार्केट जाने वाली बसों की भी एक स्टोरी है। इन लाल तख्तियों वाली बसों से बेंगलूर के आस पास के गाँव कस्बों के लोग आते रहे हैं जिन्हें खरीदारी इत्यादी करने के लिए सिटी मार्केट ज्यादा आसान पड़ता है। तो उनकी सुविधा के लिए ये बसें सीधे सिटी मार्केट जाती हैं। वहां फ्लाई ओवर के नीचे बड़ा सा बस अड्डा है। तो आप बस में लगे बोर्ड के रंग से समझ सकते हैं कि ये बस कहाँ जा रही है या कहाँ से आ रही है।
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