आजकल हर जगह मँहगाई की बड़ी चर्चा है। अब की बार जब घर गए तो गाँव देहात के आस पास घूमते हुए भूसे के दाम की चर्चा भी छिड़ गयी। पता चला की आजकल गाँवों में गेहूं की थ्रेसिंग करने के लिए अब पंजाब से बड़ी बड़ी मशीनें आती हैं। पहले की तरह खेत से बोझा उठा कर थ्रेसर तक लाने की जरूरत नही है। ये मशीनें सीधे खेत में घुसती हैं और गेहूं को निकाल कर अलग कर देती हैं। मुझे लगता है की पहले जब हम किताबों में पढ़ते थे और डिस्कवरी चैनल पर देखते थे कि बाहर के देशों में खेतों में एक बड़ी सी मशीन चलती रहती थी जो फसल में से अनाज को अलग करती थी। ये वही मशीन होगी जो अब तक सिर्फ़ बड़े किसान ही afford कर पाते होंगे।
इस मशीन की वजह से भूसा वही खेत में रह जाता है और इकठ्ठा नही हो पता है। तो इस वजह से मार्केट में भूसे की कमी हो गयी है और भूसे का दाम आसमान छू रहा है। मुझे बताया गया कि अब कोई ऐसी थ्रेसिंग मशीन भी आने लगी है जो भूसे का भी गठ्ठर बनाने लगी है। पर वो शायद आम उपयोग में अभी उपलब्ध नही है।
अगर हम बातों पर ध्यान दें तो अक्सर ही एक सामान्य सी लगने वाली बात के पीछे बड़ा छोटा सा कुछ logic छुपा होता है जो होता बहुत सटीक है। अब भूसे के प्रसंग को ही देख लीजिये, बड़े ही सामान्य तरीके से ये बातचीत शुरू हुयी थी और बड़े ही आसान तरीके से मुझे कारण भी समझा दिया गया।
Saturday, May 10, 2008
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1 comments:
मनीष भाई यह मशीन भी मिलती हे,गेहु एक ओर ओर भुसे की गाठें अलग से,लेकिन पता नही भारत मे मिलती हे या नही ? वेसे पुराना काम ही ठीक था कई लोगो को काम भी मिल जाता था,गरीबो को खाने को भी मिल जाता था, ओर अनाज भी होता था, भुसा भी खुब होता था, ओर किसान आत्महत्या भी नही करते थे
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