Friday, May 9, 2008

पुराने जमाने की यात्राएं...

मेरे वाराणसी के पैतृक निवास से मेरा गाज़ीपुर में स्थित ननिहाल कुछ अस्सी किलोमीटर दूर है। आजकल अगर जाना हो तो कार से २ घंटे या ट्रेन से सब मिला जुला कर तीन-चार घंटे लगते हैं। इस गाँव से सबसे नजदीकी शहर गाजीपुर है जो करीब २५ किलोमीटर दूर है। वाराणसी-भटनी-गोरखपुर रेल लाईन पर एक जखनियाँ नाम का स्टेशन है जहाँ से उतर कर चार किलोमीटर जाना पड़ता है। बढ़िया रोड है, उस पर ऑटो रिक्शा, बस, सब चलता है अब। ५० साल पहले साधन क्या था? या फिर उस से भी पहले?

इस बार की यात्रा में नानाजी से इस बारे में भी बातें हुई -

मैंने पूछा - रेल लाईन कब बनी थी?
उन्होंने कहा - सन् ८८ में।

अब सत्तर के दशक में पैदा हुए आदमी से "सन् ८८" कहा जाए तो वो "सन् १९८८" ही समझेगा न। पर मुझे ये पक्का पता था कि ये लाईन सन् १९८८ से काफी पहले बनी हुई है क्योंकि मैंने उस पर पहले की छोटी लाईन की छुक छुक गाड़ी से काफी यात्रा की है। तो मैंने पक्का करने के लिए पूछा "१८८८" और उन्होंने कहा "हाँ"। सुन कर ही कुछ इतिहास इतिहास की सी feeling होती है।

खैर और बातें हुई, उन्होंने बताया की गोरखपुर, भटनी, छपरा की लाईन पहले से बनी हुई थी। सन् ८८ से पहले गाँव के एक साहब जो बंगाल में नौकरी करते थे, वो जब गाँव वापस आया करते थे तो ट्रेन से भटनी उतर कर वहाँ से जखनियाँ पैदल ही आया करते थे। भटनी से जखनियाँ की दूरी कुछ ९८ किलोमीटर है। ना कोई रोड, ना ट्रेन, बस खेत खेत, मेड़ मेड़ होते हुए आना जाना होता था। जैसे हम "दो बीघा जमीन" के "बलराज साहनी" को जानते हैं। लाठी के पीछे पोटली बाँध कर।

गाँव से सबसे नजदीक का शहर गाजीपुर है। अब है और पहले भी था। गाँव में जो स्कूल था, वह कक्षा चार तक पढ़ाई होती थी। कक्षा चार तक को प्राईमरी कहते थे। मिडिल पाँच से सात तक होता था। उसके लिए जखनियाँ जाना पड़ता था। उस से ज्यादा पढ़ना हो तो फिर गाजीपुर जाओ। शहर के स्कूल में आपको वापस सात में भरती करेंगे क्योकि आप गाँव से पढ़ कर आए हैं। तो नाना जी नें गाजीपुर में सात और आठ की पढ़ाई की तब से सन् बयालीस आ गया और "अंग्रेजों भारत छोड़ो" में "बच्चों पढ़ाई छोड़ो" हो गया उनका।

अब गाजीपुर जाने के लिए आजकल तो बस है जो जिस रोड पर चलती है उस पर तार कोल सन् १९८१ में पड़ा है और नाना जी के बचपन में तो कुछ भी नही था। गाजीपुर जाने के लिए लोग भोर में ३ बजे ही चलना शुरू कर देते थे, और खेत खेत मेड़ मेड़ होते हुए दोपहर से पहले पहुचते थे। कुछ छह घंटे से ज्यादा ही समय लग जाता था। उस से आसान उनके लिए बनारस जाना होता था क्योंकि वहाँ जाने के लिए चार किलोमीटर दूर से ट्रेन मिल जाया करती थी।

एक और कहानी सुनाई नाना जी नें - एक जमाने में एक सांसद थे विश्वनाथ गहमरी जिन्होंने पूर्वांचल में सडकों की नामौजूदगी की हालत पर एक बार संसद में काफी शोर मचाया था। नेहरू जी नें सुना तो पूछा कि ये कौन शोर कर रहा है। और फिर थोड़ा ध्यान से गहमरी साहब की शिकायत को सुना। तब जाके गाजीपुर में सड़कों का कुछ विस्तार हुआ और गाँव के आसपास में कुछ सड़कें पहुचीं।

आज की तारीख में अगर मुझे बनारस से अपने ननिहाल अगर सड़क मार्ग से जाना हो तो चार अलग अलग रास्ते तो मुझे अभी याद आ रहे हैं। सरकार की दया से अभी सभी सड़कें अच्छी हालत में भी हैं। हमें अपने गाँव से मऊ के पास स्थित एक क़स्बा - मरदह जाना था तो मामा जी और नाना जी नें तीन अलग अलग सड़कें गिनवा दी। दोनों गाँवों के बीच की यात्रा नाना जी नें सन् ३७ में हांथी से की थी और जब पैदल जाया करते थे तो वही ६ घंटे लगा करते थे।

1 comments:

हर्षवर्धन said...

ये यात्राएं सहेजकर रखना जरूरी है। इस पर नजर डालिए।

http://batangad.blogspot.com/2008/05/2-7.html