अक्सर जब कोई इतिहास संबंधित किताब पढ़ता हूँ तो एक कौतुहल होता है कि उस समय जब वो घटना वास्तव में घटी होगी तो उस समय की आम जनता को कैसा लगता होगा। भारत की आजादी को ही ले लीजिये, अगस्त १९४७ में गाँव गाँव में लोग क्या सोचते होंगे?
इस बार की वाराणसी एवं आस पास की यात्रा पर जब मैं अपने नानाजी से मिला तो मैंने उनसे काफी सारी बातें करी उस जमाने के बारे में। उन्होंने बताया सन् सैतालीस में जब देश आजाद हुआ था तो गाँव गाँव में एक मुनादी बजवा दी गयी थी कि भारत आजाद हो गया है, अब हम आजाद हैं वगैरह वगैरह। इस से ज्यादा फर्क उन्हें कुछ पता नहीं चला था। पर उन्होंने बताया कि ज्यादा फर्क सन् ५१ में पता चला था जब मुनादी हुई कि "जमींदारी खत्म कर दी गयी है, अब से मालगुजारी जमींदार के बजाये सरकार लेगी"।
और भी काफी सारी बातें हुई थी जो धीरे धीरे यही उकेरुंगा।
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3 comments:
बहुत बुनियादी बात का जिक्र क्या है आपने... हमें आगे भी इंतज़ार रहेगा
कर दिया साहब एक और बात का जिक्र, ये पढ़ें - http://manishuvaach.blogspot.com/2008/05/blog-post_09.html
करते चलो खुलासा-नाना नानी और बुजुर्गों के अनुभव तो हमेशा सुनने को कान तरसते हैं. बहुत बढ़िया-सुनाते चलिये.
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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.
एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.
यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.
शुभकामनाऐं.
समीर लाल
(उड़न तश्तरी)
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