Thursday, February 28, 2008

संस्मरण - 1

बहुत पहले जब मैं एक छोटा सा बच्चा हुआ करता था और शायद एल के जी या यू के जी में रहा होऊंगा या शायद और बड़ा, तब एक मजेदार घटना घटी थी। हम दोनों भाई काफ़ी धमा चौकडी मचाया करते थे और हमारे पापा जी अक्सर हमें पढ़ाई के लिए डांटा करते थे। उनका एक तकिया कलाम हुआ करता था - "पढ़ना लिखना साढ़े बाईस!"। मुझे समझ नही आया करता था कि वो ये साढ़े बाईस के आंकड़े पर कैसे पहुचे थे, एक दिन जब फिर से डांट पड़ी तो मुझ से रहा न गया और मैंने पूछ ही लिया - "पापा जी, क्या हम दोनों भाइयों की फीस का जोड़ मिला के साढ़े बाईस होता है जो आप हमें हमेशा पढ़ना लिखना साढ़े बाईस कह कर डांटा करते हैं!"

4 comments:

anitakumar said...

जवाब क्या पाया वो तो बताइए, ये मुहावरा मैने भी नहीं सुना हुआ…:)

Manish said...

जवाब का क्या कहूं, तब वो हंसनें लगे थे और अब सब हंसते हैं सोच सोच कर!

mamta said...

बचपन की यादों का ये सिलसिला जारी रखिये।

Dr.Parveen Chopra said...

बहुत अच्छे, मनीष, अपने बचपन की यादों में ऐसे ही हम सब को शरीक करते रहिये।