कल के ट्वेंटी-२० फ़ाइनल मैच में भारत की शानदार जीत के बाद जब मैं आज सुबह अखबार पढ़ रहा था धोनी के घर से जुड़ी एक खबर पर मेरा ध्यान गया। कल के मैच के समय धोनी के परिवार से किसी नें भी वहाँ खड़े मीडिया जनों से सम्पर्क नहीं किया।
फिर मैंने इन्टरनेट पर कुछ पुरानी खबरें ढूँढी - जैसे ये "नकली शव यात्रा की खबर" जो २५ मार्च को हिंदू में आयी थी। खोजेंगे तो ऎसी बहुत सारी खबरें दिखेंगी। "चक दे इंडिया" में जो कहानी है एक असफल हॉकी खिलाड़ी की, टीम इंडिया की कहानी उस से कुछ ज्यादा अलग नहीं है। फिल्म में नायक को सात साल लगे खोयी इज़्ज़त पाने में और यहाँ ठीक ६ महीने। मार्च में जहाँ देखो वहाँ भारतीय टीम की हाय हाय, धोनी के घर को तोड़ना, मातम मनाना और ना जानें क्या नहीं हुआ था पूरे भारत में।
खेल खेलना और देखना और उसका मजा लेना अच्छा है, पर उस से ऎसी दीवानगी अच्छी नही। पर हम लोग खेल में कुछ ज्यादा ही भावुक और उत्तेजित हो जाते हैं। अब ये क्रिकेट के खिलाड़ी हम भारतीय दर्शकों की क्या इज़्ज़त करेंगे जो कभी तो उनकी शव यात्रा निकालते हैं और कभी जयजयकार करते हैं। ऐसे दर्शकों को बेपेंदी का लोटा ही कहा जाना चाहिऐ!
Tuesday, September 25, 2007
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2 comments:
गुरू, आप बनारस के हैं, मैं गोरखपुर का. फिलहाल हम भी बंगलौर छानने में जुटे हैं. मैं यहां पर एक हन्दी पोर्टल में एडीटर हूं. मेरे दो ब्लाग हैं, देखें, टिपप्णी दें... कभी मौका लगे तो बात या मुलाकात भी कर सकते हैं. पहले मेल..
www.khidkiyan.blogspot.com
www.indianbioscope.blogspot.com
दिनेश श्रीनेत
अरे वाह। मिल ही गए आप! बढ़िया है। आजकल कौन से डिस्ट्रो पर हैं?
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